Monday, May 11, 2020

सोशल मीडिया वाली इंसानियत


मौजूदा वक़्त में भौगोलिक दुनिया से इतर एक आभासी दुनिया का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है जिस पर बसने वाले लोग एक दूसरे से बिलकुल अनजान और अपरिचित तो होते ही है यहां तक की इनका भौगोलिक दुनिया से भी कोई ख़ास जुड़ाव नहीं रह जाता। इस तथन को ऐसे समझे की सोशल मीडिया पर कुछ लोगो की तथाकथिक फॉलोवर्स या फ्रेंड्स की फेहरिस्त जितनी लम्बी होगी भौगोलिक दुनिया से उस इंसान की दूरी भी उतनी ही ज़्यादा होगी, समझने के लिए थोड़ा गणित लगाना होगा लेकिन आसान है। अब आपको इनका परिचय देता हूँ की ये है कौन और करते क्या है? ये लोग है टिकटोक और उसके ही जैसे प्लेटफार्म इस्तेमाल करने वाले स्वघोषित बुद्धिजीवि जो खुद को इंसानियत का मसीहा मानते है। ये "किस्सा" है एक लाचार व्यक्ति का जिसका पाला एक ऐसे ही मसीहा से पड़ा था ।

फरबरी का महीना था, कॉलेज की परीक्षा चल रही थी और मैं अपने दोस्तों के साथ उनके ही फ्लैट पर रुका हुआ था। रात भर किताबो के साथ आँखें लड़ाते लड़ाते कब नींद आगयी पता ही नहीं चला। अगले रोज़ जब परीक्षा देने के लिए हम तीनो दोस्त कॉलेज के लिए निकले तो हमारे साथ एक बहुत ही अजीब सी घटना हुई, एक अंधे इंसान से हमसे कहाँ की उससे बस स्टॉप तक जाना है, हम बस स्टॉप तक जा रहे तो उनको भी साथ ले लिया। थोड़ा दूर चले ही थे की अचानक वो नेत्रहीन सज्जन मुझसे  बोले  की  "भैया टिकटोक नहीं बनाओगे क्या ? लाइक्स और व्यूज मिल जायेगे" टिकटोक का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए और मैंने असमंजस भरी निघाओ से अपने दोस्त की तरफ देखा तो पाया की मंझारा उसकी समझ से भी बहार है।
अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मेने पूछ ही लिया की, " आप कहना क्या चाह रह है मैं समझा नहीं ? " और जवाब मिला की " मुझे रोज़ ऐसे 2-3 बच्चे मिलते है जो मुझसे कहते की हम आपको सड़क पार करवाते हुए एक वीडियो बनायेगे और फिर उसे अपने चैनल पर अपलोड करेगे" ये सुनते ही हम कुछ पल के लिए भौचक्के से रह गए, तेज़ी से बढ़ते कदमो की रफ़्तार में कुछ कमी आयी और दिल में टीस उठी और दिमाग में बस यही एक ख्याल की किस तरह के बेशर्म लोग है ये जो एक इंसान की विकलांगता का फायदा उठा रहे है। क्या सोशल मीडिया पर नंबर.1  बने रहने की होड़ ने इतना अंधा कर दिया है की वे भूल जाते है कि किसी विकलांग को उसकी असमर्थता के बारे में याद दिलाना उसे और तकलीफ देता है.?

खैर जब संवाद आगे बढ़ा और मेने पूछा कि आप ऐसे लोगो को मना नहीं करते तो वे बोले कि " अगर मेरे अंधेपन से किसी को फायदा पहुंच रहा है तो में ये ख़ुशी ख़ुशी करने को तैयार हूँ, आखिर भगवान ने ये जीवन इसलिए ही तो दिया है कि लोगो को खुश रखा जा सके", ये सुनते ही मन रो गया और बस स्टॉप आ गया फिर वो ज़िंदा दिल इंसान बस में चढ़ कर अपनी मंज़िल को चल दिया।
उससे मुलाकात छोटी सी थी लेकिन सवाल बड़े छोड़ गयी। सवाल हमारी सोच पर, सवाल हमरी असंवेदनशीलता पर।
एक तरफ ये सकारात्मक इंसान जो भावनाओ से इतना ओत-प्रोत है कि खुद के आत्म सम्मान को एक अनजान के लिए समर्पित कर दिया और दूसरी तरफ वो असंवेदनशीलता और धूर्त लोग जो खुद के फायदे के लिए दूसरे इंसान कि भावनाओ कि क़द्र किये बिना उनका इस्तेमाल कर रहे है। सड़क और सोशल मीडिया पर आपको इस तरह के लोग और कंटेंट की भरमार मिलेगी जहाँ इन अपांग और लाचार लोगो कि मदद के नाम पर  खुलेआम नुमाइश लगती है।

सुझाब नहीं सवाल है कि, क्या ऐसा करके या होते देखने के बाद आप खुद को उस इंसान के ज़रा भी बराबर रख पायेगे...?









                                                           

No comments:

Post a Comment