Wednesday, May 20, 2020

अबकी बार "आत्मनिर्भरता" का लोलीपोप वाया मोदी सरकार


जब कभी आप मेले में किसी छोटे बच्चे के साथ खिलौने  की दूकान पर जाएंगे तो वो हमेसा ऐसा कोई तकनिकी खिलौना लेने की ज़िद करता है जिसे आप दिलाने के लिए राज़ी नहीं होते क्युकी वे बच्चा उसे चलाने के लिए न तो मानसिक रूप से तैयार होता है और न ही शारीरिक रूप से। उसकी ज़िद से खिलौना तो घर में आ जाता है लेकिन वे उसे चला नहीं पता और परेशान हो कर एक कोने में पटक देता है। लेकिन अगली बार फिर वैसा ही खिलोने के लिए ज़िद करता है, कारण उसकी नासमझी और उसका हठ। बस हमारे देश का राजनैतिक नेत्तृत्व भी उसी बच्चे की तरह वर्ताव कर रहा है जो एक लक्ष्य पूरा होने से पहले दूसरे का शंखनाद कर देता है। ये किस्सा है सरकार की कथनी और करनी के फ़र्क़ के बीच का। 

प्रधानमंत्री के 12 मई को दिए गए संबोधन के बाद से इंडिया अब सिर्फ "New" नही "आत्मनिर्भर" बनने की यात्रा भी शुरू करने जा रहा है। "लोकल के लिए वोकल" बनने के सुझाव  के बाद से "मेक इन इंडिया" वाले सोते शेर ने फिर से एक बार दहाड़ लगाई है और उम्मीद है की कम से कम इस बार तो सबको सुनाई दे।
अब फिर से स्वदेशी बनाम विदेशी की जंग छिड़ेगी। जहाँ एक तरफ व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी वाले ग्रेजुएट्स पल पल आपको विदेशी प्रोडक्ट से होने वाले भयाभय नुकसान के बारे में आगाह करने की जुगत में लग जायेगे तो वही ट्विटर पर होने वाली महाभारत का ज़िम्मा IT CELL प्रमुख मालवीय उठायेगे और कुछ वक्त के लिए #boycottchina जमकर ट्रेंड करेगा क्योंकि कम से कम हमारे देश मे IT CELL बिना किसी दवाब के अपना काम पूरी निष्ठा से करता है।

हर अभियान की तरह गोदी मीडिया इस अभियान को आपकी नज़रो में सफल बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत करेगी और सबको उनके काम अनुसार मेहनताना भी तुरन्त मिल जायेगा, वैसे MNREGA भी रोज़गार की इतनी तगड़ी गरंटी नहीं दे पाया। न्यूज़ चैनल्स पर इस अभियान को लेके प्राइम टाइम होंगे। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और राजनीतिक विशेषज्ञ इसे प्रधानमंत्री जी का मास्टर स्ट्रोक घोषित कर देंगे। बीजेपी प्रवक्ता इस योजना को 5 ट्रिलियन इकॉनमी की तरफ जाने का रोड मैप बताएंगे तो विपक्ष इसे अपनी " प्रधानमंत्री जी के जुमले" वाली सूची में तत्कालीन रूप से शामिल करेगा और फिर इन्ही सब घटनाओ के बीच एक बार फिर से "भारत बनेगा विश्व गुरु" नामक मुहिम को पूरे ज़ोर शोर से लॉन्च किया जाएगा।

अभी तक के लेख से अपने ये तय कर लिया होगा कि मैं मौजूदा सरकार का घोर विरोधी और निहायती निराशावादी किस्म का इंसान हूँ। आपका ये अनुमान गलत  नहीं है मैं हूँ विरोधी उस सरकार का जो आनन-फानन में बिना किसी नीति के नोटेबंदी और GST जैसा आत्मघाती फैसला अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देती है जिसकी गवाही भारत की गिरती  GDP ग्रोथ rate देती आयी है.   https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/policy/demonetisation-all-cost-and-little-benefit/articleshow/65639832.cms
 मैं विरोधी हूँ उस सरकार जो FDI में विदेशी हिस्सेदारी को २३% से बढ़ा कर ४९% कर देती है जिसके परिणामस्वरूप देश के बड़े उद्योग तो प्रभावित होते  ही है साथ ही साथ छोटे और मंझोले व्यापारियों को भी मार्केट कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ता है. अब ऐसे कैसे बनेगा भारत "लोकल के लिए वोकल"

मुझे निराशा तब होती है जब अमेज़न जैसी विदेशी ई-कॉमर्स कम्पनी कोडियो के भाव सामान बेच कर जहाँ भारत के रिटेल बाजार को लिगलती जा रही है तो  वही  प्रधानमंत्री जी इसके खिलाफ इतना करते है की वे अमेज़न के सीईओ "जेफ़ बेज़ोस" को मिलने का समय नहीं देते है और मुददा वही खत्म।    https://theprint.in/economy/why-no-one-in-modi-govt-met-amazons-jeff-bezos-this-time-and-instead-rudely-snubbed-him/350725/ 
मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मुद्रा योजना और न जाने क्या क्या आडंबर के बाद भी बाहरी सामान का इम्पोर्ट कम नहीं होता और हमारा एक्सपोर्ट बढ़ता नहीं। फिर मन निरास होके  यही सवाल पूछता है की आखिर हुकूमत की व्यपार को लेके नीति  क्या  है ?

तो ये हैं मेरे विरोध और निराशावादी होने के कुछ प्रमुख कारण जिनकी वजह से अब मुझे भी "उनकी" हर बात  जुमले के माफ़िक ही लगती है
खैर ये तो अब प्रधानमंत्री जी को ही तय  करना है की क्या सिर्फ सोशल मीडिया पर भारत को  #आत्मनिर्भरभारत बनाना है या हकीकत में देश के हर एक टपके को रोज़गार और व्यापर की मूलभूत सुविधा दे कर अपने बुनियादी ढांचे को मज़बूत करना है। देश अभी भी उस गुजरात वाले "नरेंद्र भाई मोदी" का इंतज़ार कर रहा है जिन्होंने गुजरात मॉडल के नाम पर वोट माँगा था और देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का वादा किया था.


Monday, May 11, 2020

सोशल मीडिया वाली इंसानियत


मौजूदा वक़्त में भौगोलिक दुनिया से इतर एक आभासी दुनिया का विस्तार बहुत तेज़ी से हो रहा है जिस पर बसने वाले लोग एक दूसरे से बिलकुल अनजान और अपरिचित तो होते ही है यहां तक की इनका भौगोलिक दुनिया से भी कोई ख़ास जुड़ाव नहीं रह जाता। इस तथन को ऐसे समझे की सोशल मीडिया पर कुछ लोगो की तथाकथिक फॉलोवर्स या फ्रेंड्स की फेहरिस्त जितनी लम्बी होगी भौगोलिक दुनिया से उस इंसान की दूरी भी उतनी ही ज़्यादा होगी, समझने के लिए थोड़ा गणित लगाना होगा लेकिन आसान है। अब आपको इनका परिचय देता हूँ की ये है कौन और करते क्या है? ये लोग है टिकटोक और उसके ही जैसे प्लेटफार्म इस्तेमाल करने वाले स्वघोषित बुद्धिजीवि जो खुद को इंसानियत का मसीहा मानते है। ये "किस्सा" है एक लाचार व्यक्ति का जिसका पाला एक ऐसे ही मसीहा से पड़ा था ।

फरबरी का महीना था, कॉलेज की परीक्षा चल रही थी और मैं अपने दोस्तों के साथ उनके ही फ्लैट पर रुका हुआ था। रात भर किताबो के साथ आँखें लड़ाते लड़ाते कब नींद आगयी पता ही नहीं चला। अगले रोज़ जब परीक्षा देने के लिए हम तीनो दोस्त कॉलेज के लिए निकले तो हमारे साथ एक बहुत ही अजीब सी घटना हुई, एक अंधे इंसान से हमसे कहाँ की उससे बस स्टॉप तक जाना है, हम बस स्टॉप तक जा रहे तो उनको भी साथ ले लिया। थोड़ा दूर चले ही थे की अचानक वो नेत्रहीन सज्जन मुझसे  बोले  की  "भैया टिकटोक नहीं बनाओगे क्या ? लाइक्स और व्यूज मिल जायेगे" टिकटोक का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए और मैंने असमंजस भरी निघाओ से अपने दोस्त की तरफ देखा तो पाया की मंझारा उसकी समझ से भी बहार है।
अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मेने पूछ ही लिया की, " आप कहना क्या चाह रह है मैं समझा नहीं ? " और जवाब मिला की " मुझे रोज़ ऐसे 2-3 बच्चे मिलते है जो मुझसे कहते की हम आपको सड़क पार करवाते हुए एक वीडियो बनायेगे और फिर उसे अपने चैनल पर अपलोड करेगे" ये सुनते ही हम कुछ पल के लिए भौचक्के से रह गए, तेज़ी से बढ़ते कदमो की रफ़्तार में कुछ कमी आयी और दिल में टीस उठी और दिमाग में बस यही एक ख्याल की किस तरह के बेशर्म लोग है ये जो एक इंसान की विकलांगता का फायदा उठा रहे है। क्या सोशल मीडिया पर नंबर.1  बने रहने की होड़ ने इतना अंधा कर दिया है की वे भूल जाते है कि किसी विकलांग को उसकी असमर्थता के बारे में याद दिलाना उसे और तकलीफ देता है.?

खैर जब संवाद आगे बढ़ा और मेने पूछा कि आप ऐसे लोगो को मना नहीं करते तो वे बोले कि " अगर मेरे अंधेपन से किसी को फायदा पहुंच रहा है तो में ये ख़ुशी ख़ुशी करने को तैयार हूँ, आखिर भगवान ने ये जीवन इसलिए ही तो दिया है कि लोगो को खुश रखा जा सके", ये सुनते ही मन रो गया और बस स्टॉप आ गया फिर वो ज़िंदा दिल इंसान बस में चढ़ कर अपनी मंज़िल को चल दिया।
उससे मुलाकात छोटी सी थी लेकिन सवाल बड़े छोड़ गयी। सवाल हमारी सोच पर, सवाल हमरी असंवेदनशीलता पर।
एक तरफ ये सकारात्मक इंसान जो भावनाओ से इतना ओत-प्रोत है कि खुद के आत्म सम्मान को एक अनजान के लिए समर्पित कर दिया और दूसरी तरफ वो असंवेदनशीलता और धूर्त लोग जो खुद के फायदे के लिए दूसरे इंसान कि भावनाओ कि क़द्र किये बिना उनका इस्तेमाल कर रहे है। सड़क और सोशल मीडिया पर आपको इस तरह के लोग और कंटेंट की भरमार मिलेगी जहाँ इन अपांग और लाचार लोगो कि मदद के नाम पर  खुलेआम नुमाइश लगती है।

सुझाब नहीं सवाल है कि, क्या ऐसा करके या होते देखने के बाद आप खुद को उस इंसान के ज़रा भी बराबर रख पायेगे...?